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लोक अदालत : त्वरित, सुलभ और सहमति आधारित न्याय प्रणाली

By Next Team Writer

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आज हम एडवोकेट दीपिका करनाणी के माध्यम से भारत की न्याय प्रणाली के एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग लोक अदालत के बारे में जानेंगे। लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था का वह सशक्त माध्यम है, जो आम जनता को सरल, सस्ता और शीघ्र न्याय उपलब्ध कराता है।


लोक अदालत का वैधानिक आधार
भारत में लोक अदालत को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत वैधानिक मान्यता प्रदान की गई है। इसका उद्देश्य न्यायालयों पर बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करना तथा विवादों का आपसी सहमति से समाधान करना है।

लोक अदालत का अर्थ
लोक अदालत का शाब्दिक अर्थ है- “जनता की अदालत”। यह पारंपरिक अदालतों की तरह नहीं होती, जहाँ न्यायाधीश यह तय करते हैं कि कौन सही है और कौन गलत। इसके विपरीत, लोक अदालत एक ऐसा मंच है जहाँ विवाद के दोनों पक्ष आपस में बैठकर सुलह और समझौते के माध्यम से अपने मामले का निपटारा करते हैं।

लोक अदालत की प्रमुख विशेषताएँ

  1. लोक अदालत में निर्णय बहस या प्रतिद्वंद्विता से नहीं, बल्कि आपसी सहमति से होता है।
  2. इसकी प्रक्रिया सरल, अनौपचारिक और समयबद्ध होती है, जिससे आम नागरिक भी सहजता से अपनी बात रख सकता है।
  3. लोक अदालत में कोई कोर्ट फीस नहीं ली जाती, और यदि पहले से जमा हो तो उसे वापस कर दिया जाता है।
  4. लोक अदालत द्वारा दिया गया निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता है, जिसके विरुद्ध अपील का कोई प्रावधान नहीं होता।
  5. यहाँ केवल वही मामले लिए जाते हैं जिनमें समझौते की संभावना होती है।

लोक अदालत में किन मामलों का निपटारा होता है
लोक अदालत में विभिन्न प्रकार के विवादों का समाधान किया जाता है, जैसे

  • दीवानी वाद
  • धन वसूली से संबंधित मामले
  • चेक बाउंस (धारा 138) के प्रकरण
  • भूमि, किराया और कब्जा संबंधी विवाद
  • बीमा, ऋण और उपभोक्ता विवाद
  • बिजली, पानी और टेलीफोन बिल से जुड़े मामले
  • पारिवारिक विवाद, जैसे भरण-पोषण
  • मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण
  • आपराधिक मामलों में केवल समझौते योग्य अपराध

किन मामलों में लोक अदालत नहीं लगती
गंभीर प्रकृति के अपराध, जिनमें समझौता संभव नहीं होता, लोक अदालत के दायरे में नहीं आते।

प्री-लिटिगेशन मामलों का निपटारा
लोक अदालत की एक विशेषता यह भी है कि इसमें प्री-लिटिगेशन मामलों का निपटारा किया जाता है, अर्थात वे विवाद जो अभी तक किसी न्यायालय में दर्ज नहीं हुए हैं। इससे मुकदमेबाजी से पहले ही विवाद समाप्त हो जाता है।

निष्कर्ष
लोक अदालत भारतीय न्याय प्रणाली में न्याय को जन-जन तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम है। यह न केवल समय और धन की बचत करती है, बल्कि समाज में आपसी सौहार्द और समझ को भी बढ़ावा देती है।

Next Team Writer

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