
सम्पत्ति के प्रकार एक व्यक्ति के पास पैतृक, विरासत और स्वअर्जित संपत्ति हो सकती है।
पैतृक संपत्ति पैतृक संपत्ति वह होती है जो परदादा से दादा को, दादा से पिता को मिली हो। यानि दादा पूर्वजों से वह संपत्ति चली आ रही हो। यानि पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त होने वाली संपत्ति पैतृक संपत्ति होती है।
विरासत सम्पत्ति अगर, माता- पिता के पास वाली संपत्ति हमें प्राप्त होती है। चाहे वह वसीयत से मिली हो या चाहे गिफ्ट से मिली हो या उनके देहांत के बाद वारिस के रूप में प्राप्त हुई हो। यह संपत्ति विरासत में मिली संपत्ति कहलाती है।
विशेष नोट माता, पिता, भाई, बहन से मिली संपत्ति विरासत में मिली संपत्ति कहलाती है। जबकि पैतृक संपत्ति दादा, परदादा से मिलती है।
स्वअर्जित संपत्ति यह व्यक्ति स्वयं अर्जित करता है। इसका मालिक व्यक्ति स्वयं होता है। इसमें किसी का भी हिस्सा नहीं होता है। इस संपत्ति का व्यक्ति अपने इच्छानुसार उपयोग, उपभोग और हस्तांतरण कर सकता है। कोई भी व्यक्ति उसमें बाधा नहीं डाल सकता।
पैतृक संपत्ति का विभाजन कैसे हो?
इसमें सहस्वामी या पैतृक संपत्ति के हिस्सेदार, चाहे वह पुरुष हो या महिला हो। अगर पैतृक संपत्ति के विभाजन के सम्बंध में सभी हिस्सेदार अगर सहमत हो तो विभाजन पत्र लिखा जाता है। यह विभाजन पत्र पंजीयक कार्यालय के यहां रजिस्टर्ड होना चाहिए। इस विभाजन पत्र में स्पष्ट होना चाहिए कि यह हमारी पैतृक संपत्तियां हैं और इसके इतने हिस्सेदार है और यह-यह संपत्ति इस-इस हिस्सेदार के पाँति आई है।
यह पत्र सभी पक्षकारों की उपस्थिति में उपपंजीयक कार्यालय में रजिस्टर्ड होता है। इसे विभाजन माना जाता है।
अगर, इसमें कोई हिस्सेदार सहमत नहीं हो रहा है तो उस स्थिति में एक दावा पैतृक संपत्ति के सम्बंध में विभाजन चाहने वाला व्यक्ति संबंधित न्यायालय में पेश करेगा और बताएगा कि यह अमुक-अमुक हमारी पैतृक संपत्तियां है, जिनमें इन-इन व्यक्तियों का इतना-इतना हिस्सा कानूनन बनता है। वो दावा पेश होने के बाद न्यायालय सम्बंधित व्यक्तियों को एक नोटिस जारी करेगा। जिसे आपत्ति हो, वह आपत्ति पेश कर सकता है।
न्यायालय दोनों पक्षों को सुनेगा और दस्तावेजों का अवलोकन करेगा।अगर न्यायालय को लगता है कि संपत्ति का विभाजन किया जा सकता है तो न्यायालय संपत्ति का विभाजन कर देगा और डिक्री जारी करेगा।
संपत्ति में हिस्सेदारी अब बात आती है कि किसके हिस्से में संपत्ति का कौनसा भाग आये?
इस सम्बंध में न्यायालय द्वारा एक कमिश्नर जारी किया जाता है। जो मौके पर जाकर संपत्ति की सम्पूर्ण स्थिति, नाप, निर्माण, पक्षकार, विभाजन सम्बंधी जानकारी आदि लेगा और एक रिपोर्ट न्यायालय में पेश करेगा। उस आधार पर न्यायालय द्वारा संपत्ति का विभाजन किया जा सकता है।
अगर कोई स्थिति ऐसी होती है जिसमें संपत्ति का विभाजन मौके अनुसार संभव नहीं हो। जैसे कि कोई छोटी संपत्ति है जिसका विभाजन आधा-आधा फुट भी नहीं हो सकता। तो उस संपत्ति के विक्रय का आदेश भी कोर्ट दे सकता है। और उसके बाद विक्रय राशि पक्षकारों के मध्य वितरित कर दी जाएगी।
विभाजन के सम्बंध में एक अधिनियम 1893 का बना हुआ है। जिसकी धारा 9 के अनुसार पैतृक संपत्ति का विभाजन करवाने के लिए कोई भी सहस्वामी न्यायालय में दावा विभाजन के लिए प्रस्तुत कर सकता है।
पैतृक संपत्ति का विभाजन सभी पक्षकारों द्वारा सहमति से और रजिस्टर्ड विभाजन पत्र द्वारा भी किया जा सकता है। और न्यायालय के माध्यम से भी किया जा सकता है।
विशेष प्रायः यह देखा जाता है कि 50रुपये, 100 रुपये, 200 रुपये के स्टाम्प पर विभाजन और हिस्सा पाँति लिख देते हैं। लेकिन, यह कानून सम्मत नहीं है और यह न्यायालय में ग्राह्य नहीं है। विभाजन रजिस्टर्ड विभाजन पत्र द्वारा या न्यायालय द्वारा ही हो सकता है। आपस में लिखा पढ़ी द्वारा जो विभाजन किया जाता है और उसका रजिस्ट्रेशन नहीं होता है तो कानून में उसकी कोई अहमियत नहीं होती है। और भविष्य में विवाद का विषय बना रहता है।
संपत्ति में पुरुष, महिला, पुत्र, पुत्री, पोता, पौत्री सभी का बराबर हक व हिस्सा होता है। पुत्री व पोती को विभाजन से अलग नहीं किया जा सकता। इनका अधिकार भी पुत्रवत होता है। इसलिए भविष्य में विवाद से बचने के लिए विभाजन में पुत्र के साथ पुत्री/पौत्री और सभी वारिसानो को भी पक्षकार बनाया जाना चाहिए।