
जब FR पुलिस न्यायालय में पेश करती है तो न्यायालय परिवादी पक्ष को नोटिस देकर सूचित करता है। परिवादी न्यायालय में हाजिर होकर अगर FR से असंतुष्ट है तो उसके सन्दर्भ में आपत्तियां प्रस्तुत करेगा। जिसको हम “नाराजी पिटीशन” के नाम से जानते हैं।
नाराजी पिटीशन पेश होने के बाद न्यायालय उसे परिवाद पत्र के रूप में ट्रीट करेगा और धारा 223 BNNS के अंतर्गत परिवादी की परीक्षा करेगा यानी जांच, साक्ष्य और बयान लेगा। यदि, अन्य कोई गवाह है जो परिवादी के कथन को समर्थन देता है तो उसके भी बयान न्यायालय लेगा।
बयान, और साक्ष्य लेने के बाद उन बयानों और जांच से कुछ अपराध घटित होना न्यायालय पाता है तो उस सम्बंध में मुल्जिम पक्ष के विरुद्ध अपराध के प्रसंज्ञान का आदेश पारित करेगा और FR को नामंजूर करते हुए मुल्जिम पक्ष को समन या वारंट से न्यायालय में हाजिर होने के लिए बाध्य करेगा।