भारत के धार्मिक और आध्यात्मिक इतिहास में जिन महापुरुषों ने अपने चिंतन, तप और साहसिक निर्णयों से समाज को नई दिशा दी, उनमें तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम आचार्य आचार्य भिक्षु (भीखणजी) का नाम अत्यंत गौरव से लिया जाता है। वे केवल एक संत नहीं, बल्कि एक चिंतक, सुधारक और अनुशासन के प्रतीक थे।
आचार्य भिक्षु का जीवन साधना, संयम, तप और अहिंसा की चरम पराकाष्ठा था। दीक्षा के केवल आठ वर्षों में ही उन्होंने आगम साहित्य का गहन अध्ययन कर यह अनुभव किया कि जैन समाज में आचार-विचार और आचरण में गंभीर भिन्नता आ चुकी है। धार्मिक समाज केवल आगमों की दुहाई दे रहा है, पर वास्तविक जीवन व्यवहार उन सिद्धांतों से भटक गया है।
अपने अनुभव और जिज्ञासाओं को लेकर वे अपने दीक्षा गुरु पूज्य आचार्य रघुनाथजी के समक्ष पहुँचे। उन्होंने निःसंकोच भाव से अपने मन की बात रखी। रघुनाथजी ने उत्तर दिया –
“भीखण, तेरा कथन अन्यथा नहीं है, परंतु यह पंचम आरा है। इसमें शुद्ध साधुत्व निभाना सरल नहीं है। पले जैसा ही पालो।”
गुरु के इस उत्तर से आचार्य भिक्षु का अंतर्मन और अधिक मंथन में डूब गया। उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि जो विचार उनके मन में उठे हैं, वे मिथ्या नहीं हैं। तब उन्होंने निश्चय किया कि जब साधना के लिए गृह-त्याग कर लिया है, तो अब सत्य साधना के मार्ग पर अविचल चलना ही उद्देश्य होना चाहिए।
अभिनिष्क्रमण का साहसिक निर्णय
विक्रम संवत 1817 की चैत्र सुदी नवमी, स्थान– बगड़ी (मारवाड़)। यही वह ऐतिहासिक क्षण था, जब आचार्य भिक्षु ने स्थानकवासी संप्रदाय से अभिनिष्क्रमण कर दिया और भविष्य के एक नए पंथ – तेरापंथ की नींव रखी।
लेकिन यह निर्णय आसान नहीं था। नगर के स्थानकवासी समाज ने घोषणा कर दी कि कोई भी व्यक्ति भीखणजी को आश्रय देगा तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। संयोगवश, उसी समय आंधी का भीषण प्रकोप भी आरंभ हो गया।
इन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आचार्य भिक्षु डगमगाए नहीं। नगर के बाहर श्मशान घाट में बनी जैतसिंहजी की छतरी पर उन्होंने रात्रि प्रवास किया। वह स्थान इतना छोटा था कि पाँच संत भी साथ बैठ नहीं सकते थे। रात्रि शयन का कोई प्रबंध नहीं था, लेकिन उन्होंने पूरी रात अपने साथियों के साथ धर्म चर्चा करते हुए बिताई।
संघ के बीज से वटवृक्ष तक
आचार्य भिक्षु का संकल्प बल समय के साथ तपकर कुंदन बना। उन्होंने केवल विरोध नहीं किया, बल्कि आगमिक आदर्शों पर आधारित एक ऐसा पंथ खड़ा किया, जिसकी नींव में साधुता, मर्यादा, तात्त्विक चिंतन और अनुशासन था।
धीरे-धीरे तेरापंथ समाज में एक संगठित, अनुशासित और विवेकशील परंपरा के रूप में स्थापित हुआ। उनके द्वारा बोया गया यह बीज आगे चलकर एक विशाल वटवृक्ष बना, जिसमें आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ जैसे महान विभूतियों ने अपने विचारों, प्रवचनों और साहित्य के माध्यम से इसे जैन भोग्य ही नहीं, जन भोग्य बना दिया।
वर्तमान में तेरापंथ की गरिमा
आज तेरापंथ केवल एक संप्रदाय नहीं, बल्कि एक विचारधारा है, जिसका अनुशासन, सेवा और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में देश-विदेश में विशेष स्थान है।
वर्तमान में आचार्य महाश्रमण, अपने पैदल विहार, नशामुक्ति, नैतिकता और सद्भावना के संदेशों के साथ तेरापंथ की गरिमा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा रहे हैं। उनकी मृदुभाषिता, तपस्विता और अपार सहिष्णुता तेरापंथ को विश्व स्तर पर सम्मान दिला रही है।
आचार्य भिक्षु के अभिनिष्क्रमण दिवस पर हम इस महान आत्मा को शत-शत नमन करते हैं, जिन्होंने न केवल स्वयं का जीवन साधना को समर्पित किया, बल्कि हजारों-लाखों को सच्चे धर्म और शुद्ध साधना की राह दिखाई।