आज संपत्तियों के विवाद दिनोंदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व हम सभी ने एक राजपरिवार की संपत्तियों को लेकर हुई चर्चाओं को खूब सुना था। भारतभर में संपत्तियों के अनगिनत मामले सही वसीयत के नहीं होने के कारण कोर्ट कचहरी के दहलीज पर पड़े हुए हैं। ऐसे में वसीयतनामा एकमात्र विकल्प होता है कि आने वाली पीढ़ी संपत्ति को लेकर विवाद न करें। परन्तु जानकारी के अभाव में बहुत से व्यक्ति इसे कर पाने में असमर्थ महसूस करते हैं।

आज आपको वसीयत/ इच्छापत्र/ विल के सम्बंध में बताया जा रहा है। किसी व्यक्ति द्वारा अपने जीवनकाल में अपनी निजी संपत्तियों के सम्बंध में अपनी मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकारी किसको बनाना चाहता है या वह संपत्ति किसको देना चाहता है, उसका एक पत्र में लिखित में उल्लेख कर दिया जाता है तो उसे वसीयतनामा माना जाता है। कोई भी वयस्क व्यक्ति अपनी संपत्तियों का वसीयतनामा अपनी मृत्यु से पहले कर सकता है। वसीयतनामा मृत्यु के बाद प्रभावशाली माना जाता है। वसीयत करने वाला व्यक्ति अपने वसीयतनामा को जीवित अवस्था में कभी भी रद्द/कैंसिल/समाप्त/परिवर्तित कर सकता है। क्योंकि वह अपने जीवनकाल में अपनी संपत्तियों का स्वयं मालिक होता है।
वसीयत एक व्यक्ति अनेक बार कर सकता है। इनमें जो अंतिम वसीयत होगी, वही प्रभावशाली मानी जायेगी। अंतिम वसीयत से पहले वाली सभी वसीयत शून्य मानी जायेगी।
वसीयतनामा करने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए। मानसिक अस्वस्थ व्यक्ति के द्वारा की गई वसीयत कानूनन रूप से अप्रभावी मानी जाती है। वसीयत स्वतन्त्र रूप से और बिना किसी दबाव के होनी चाहिए, तभी उसे सही माना जाता है।
वसीयतनामा में दो गवाहों का होना अत्यंत आवश्यक है और उक्त दोनों दोनों गवाह भी स्वस्थ मानसिकता वाले होने चाहिए। इन दोनों गवाहों की आवश्यकता तब होती है जब विवाद की स्थिति बनती है। वसीयतनामा के गवाह के बयान महत्त्वपूर्ण होते है क्योंकि वसीयत करने वाले व्यक्ति का देहांत हो जाता है तो इन्हीं गवाहों के आधार पर वसीयतनामा साबित या नासाबित होता है। बिना गवाह वसीयतनामा कानूनन अमान्य होता है।
वसीयतनामा जिसके पक्ष में किया जाता है उस व्यक्ति की कोई सक्रियता वसीयतनामा में नहीं होनी चाहिए और जिस व्यक्ति के पक्ष में वसीयतनामा किया जा रहा है उस व्यक्ति के वसीयतनामा में हस्ताक्षर, उपस्थिति आदि नहीं होनी चाहिए, वरना वह वसीयतनामा संदिग्ध माना जा सकता है।
वसीयतनामा एक व्यक्ति की अपनी संपत्तियों के सम्बंध में उन संपत्तियों का वसीयतकर्ता के मरने के बाद मालिक कौन होगा, इस सम्बंध में वसीयतकर्ता अपनी इच्छा व्यक्त करता है। इसलिए वसीयतनामा को हिंदी में इच्छापत्र भी कहा जाता है। वासीयतनामा एकपक्षीय होता है। वसीयतनामा में संपत्ति के मूल्य के सम्बंध में कोई लेन देन नहीं होना चाहिए। वसीयत करने वाला स्वयं अपनी हस्तलिपि में वसीयत लिख सकता है या किसी अन्य से लिखवा सकता है या टाइप भी करवा सकता है। वसियत किसी अन्य से लिखवाई जा रही है तो लिखने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर भी वसीयतनामा पर होने चाहिए।
वसीयतनामा कानूनी रजिस्टर्ड होना जरूरी नहीं है। वसीयतनामा को वेटेज देना हो तो उसे रजिस्ट्रार कार्यालय में रजिस्टर भी करवाया जा सकता है। कानूनी रूप से सही और वैध वसीयतनामा होने पर वसीयतनामा के अनुसार संपत्तियों का वितरण वसीयतकर्ता की मृत्यु के पश्चात होगा, ना कि वारिसों के अनुसार। वसीयतकर्ता अपनी वसीयत में अपने वारिस या वारिसानों को संपत्ति के हक व हिस्सा वंचित कर सकता है।
अधिक जानकारी के लिए आप एडवोकेट मोहनलाल सोनी से संपर्क कर सकते हैं। 9414417307