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पति-पत्नी किन आधारों पर ले सकते हैं तलाक? जानिए हिन्दू विवाह अधिनियम में क्या हैं प्रावधान

By Next Team Writer

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एडवोकेट दीपिका करनाणी ने बताया- क्रूरता, परित्याग, धर्म परिवर्तन समेत कई आधारों पर मिल सकती है विवाह विच्छेद की डिक्री

हिन्दू धर्म को मानने वाले पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंधों के टूटने की स्थिति में न्यायालय से विवाह विच्छेद (तलाक) की डिक्री प्राप्त की जा सकती है। एडवोकेट दीपिका करनाणी ने बताया कि हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 में तलाक के विभिन्न आधार निर्धारित किए गए हैं, जिनके आधार पर पति या पत्नी न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं।

उन्होंने बताया कि यदि विवाह के बाद पति या पत्नी में से किसी ने किसी अन्य व्यक्ति के साथ शारीरिक संबंध स्थापित किए हों, तो यह तलाक का आधार बन सकता है। इसी प्रकार किसी एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के साथ शारीरिक या मानसिक क्रूरता करना भी विवाह विच्छेद का वैधानिक आधार है।

दो वर्ष से अधिक परित्याग भी तलाक का आधार

करनाणी ने बताया कि यदि पति या पत्नी में से किसी एक ने बिना उचित कारण के दूसरे पक्ष का लगातार दो वर्ष या उससे अधिक समय तक परित्याग कर रखा हो तथा वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन नहीं किया हो, तो पीड़ित पक्ष तलाक की मांग कर सकता है।

धर्म परिवर्तन और मानसिक विकार के मामलों में भी राहत

यदि पति या पत्नी में से किसी ने हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य धर्म स्वीकार कर लिया हो, तो दूसरा पक्ष विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकता है। इसके अलावा किसी पक्ष का असाध्य मानसिक विकार या विकृत चित्त होना तथा ऐसी स्थिति में दूसरे पक्ष के लिए साथ रहना असंभव हो जाना भी तलाक का आधार माना गया है।

कुष्ठ रोग, रतिज रोग और सात वर्ष से लापता होना

उन्होंने बताया कि असाध्य कुष्ठ रोग अथवा गंभीर रतिज रोग से पीड़ित होने की स्थिति में भी विवाह विच्छेद की मांग की जा सकती है। वहीं यदि किसी व्यक्ति के बारे में लगातार सात वर्ष तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हो और उसके जीवित होने का कोई प्रमाण न हो, तो उसे सिविल डेथ मानते हुए तलाक की डिक्री प्राप्त की जा सकती है।

संन्यास लेने पर भी मिल सकता है विवाह विच्छेद

यदि पति या पत्नी में से कोई एक धार्मिक परंपराओं के अनुसार संन्यास ग्रहण कर लेता है, तो दूसरा पक्ष तलाक के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

न्यायालय के आदेश की अवहेलना भी कारण

धारा 9 के अंतर्गत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना संबंधी न्यायालय की डिक्री का एक वर्ष से अधिक समय तक पालन नहीं होने पर भी दूसरा पक्ष विवाह विच्छेद की मांग कर सकता है।

दूसरी शादी या बलात्कार का दोषी होने पर भी अधिकार

एडवोकेट करनाणी ने बताया कि विवाह के बाद किसी पक्ष द्वारा दूसरी शादी कर लेना भी तलाक का आधार है। इसके अतिरिक्त यदि पति विवाह के बाद बलात्कार जैसे अपराध का दोषी पाया जाता है, तो पत्नी विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है।

आपसी सहमति से भी हो सकता है तलाक

उन्होंने बताया कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(बी) के तहत पति-पत्नी आपसी सहमति से भी तलाक ले सकते हैं। इसके लिए दोनों का कम से कम एक वर्ष से अलग-अलग रहना और विवाह समाप्त करने पर सहमत होना आवश्यक है।

सामान्यतः न्यायालय दोनों पक्षों को पुनर्विचार के लिए छह माह का समय देता है, हालांकि परिस्थितियों के अनुसार इस अवधि को कम भी किया जा सकता है। यदि निर्धारित अवधि के बाद भी दोनों पक्ष तलाक पर सहमत रहते हैं, तो न्यायालय विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर देता है।

एडवोकेट दीपिका करनाणी ने बताया कि अगले अंक में शून्य (Void) और शून्यकरणीय (Voidable) विवाह के कानूनी प्रावधानों की विस्तृत जानकारी दी जाएगी।

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