‘राजस्थानी में शिक्षा और रोजगार मौलिक अधिकार, राजनीतिक उपेक्षा से अब तक नहीं मिली संवैधानिक मान्यता’
NEXT 6 जुलाई, 2026 श्रीडूंगरगढ़। राजस्थानी की प्रख्यात साहित्यकार एवं राजस्थली के संपादक मंडल की सदस्या किरण राजपुरोहित ‘नितिला’ को माधव विश्वविद्यालय ने पीएचडी की उपाधि प्रदान की है। उन्होंने “राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता : एक राजनीतिक अध्ययन” विषय पर सहायक प्रोफेसर डॉ. विशाल भट्टाचार्य के निर्देशन में शोध कार्य पूरा किया।
उपाधि ग्रहण करने के बाद किरण राजपुरोहित ने कहा कि करीब आठ करोड़ राजस्थानियों की मातृभाषा राजस्थानी होने के बावजूद इसे आज तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है। उनका कहना है कि मातृभाषा में शिक्षा और रोजगार प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन राजनीतिक उपेक्षा के कारण यह अधिकार अब भी अधूरा है।
उन्होंने कहा कि प्राथमिक शिक्षा में राजस्थानी के स्थान पर हिंदी और अंग्रेजी माध्यम होने से बच्चों के स्वाभाविक भाषाई विकास पर असर पड़ता है। वहीं प्रतियोगी परीक्षाओं में राजस्थानी भाषा, इतिहास और संस्कृति से जुड़े प्रश्नों के अभाव में स्थानीय अभ्यर्थियों को अपने ही राज्य में रोजगार के अवसरों में नुकसान उठाना पड़ता है। उनके अनुसार मातृभाषा आधारित शिक्षा और संवैधानिक मान्यता का अभाव प्रदेश के विकास, रोजगार और पलायन जैसी समस्याओं से भी जुड़ा हुआ है।
प्रख्यात साहित्यकार श्याम महर्षि ने कहा कि ज्यूं सैंणी तितली, कांठळ, नेव निवाळी, गुड़िया रा बाळ, आंख्यां आळा आंधा और झर-झर निर्झर जैसी साहित्यिक कृतियों की रचयिता किरण राजपुरोहित की यह उपलब्धि मातृभाषा में शिक्षा और शोध को नई दिशा देने वाली है।
इस अवसर पर मरूभूमि शोध संस्थान के निदेशक डॉ. बी.एल. भादानी सहित डॉ. मदन सैनी, मरूभूमि शोध संस्थान के कार्यालय सचिव साहित्यकार रवि पुरोहित, डॉ. गजादान चारण, डॉ. चेतन स्वामी, रामचन्द्र राठी, विजय महर्षि, महावीर माली, श्रीभगवान सैनी, भगवती पारीक और सरोज शर्मा ने उन्हें बधाई देते हुए इसे राजस्थानी साहित्य जगत के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया।



















