श्रीडूंगरगढ़ कोर्ट का फैसला: बालक ने भी नानी के साथ रहने की जताई इच्छा, पालन-पोषण और शिक्षा को माना अहम
NEXT 13 अक्टूबर, 2026 श्रीडूंगरगढ़। नाबालिग बच्चों की संरक्षकता के मामलों में बच्चे का हित और उसकी इच्छा कितनी महत्त्वपूर्ण है, इसका उदाहरण श्रीडूंगरगढ़ के अपर जिला एवं सेशन न्यायालय के एक फैसले में देखने को मिला। न्यायालय ने नाबालिग वासुदेव उर्फ कान्हा की स्थायी संरक्षकता प्राप्त करने के लिए उसके पिता भागीरथ की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी। बालक अपनी मां की मृत्यु के बाद महज 11 माह की उम्र से अपनी नानी कौशल्या देवी के पास रह रहा था। न्यायालय में बालक ने भी अपनी नानी के साथ रहने की इच्छा जताई।
अप्राथिया कौशल्या देवी के अधिवक्ता साजिद खान ने बताया कि अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश कृष्ण कान्त ने 7 अक्टूबर 2026 को दिए निर्णय में संरक्षकता एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 7 व 25 के तहत प्रस्तुत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।
मां की मृत्यु के बाद नानी के पास रह रहा था बालक
प्रकरण के अनुसार, भागीरथ का विवाह 11 जुलाई 2013 को ठुकरियासर निवासी सीता के साथ हुआ था। दोनों के पुत्र वासुदेव उर्फ कान्हा का जन्म हुआ। 30 जून 2015 को सीता की मृत्यु के बाद बालक अपनी नानी कौशल्या देवी के पास रहने लगा। पत्नी की मृत्यु के मामले में भागीरथ के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ था, जिसमें बाद में उसे दोषमुक्त कर दिया गया। इसके बाद पिता ने अपने पुत्र की स्थायी संरक्षकता प्राप्त करने के लिए न्यायालय में याचिका दायर की।
पिता ने शिक्षा और बेहतर भविष्य का दिया तर्क
पिता की ओर से दलील दी गई कि वह अपने पुत्र का प्राकृतिक संरक्षक है और उसे अच्छी शिक्षा देकर उसका सर्वांगीण विकास कर सकता है। वहीं, नानी की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि बालक लंबे समय से उनके साथ रह रहा है और उसकी देखभाल एवं पढ़ाई की व्यवस्था भी वही कर रही हैं। बालक के पिता ने दूसरा विवाह भी कर लिया था।
आठ साल तक खर्च नहीं भेजने की बात भी आई सामने
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने साक्ष्यों का विश्लेषण किया। निर्णय में उल्लेख किया गया कि पिता ने प्रतिपरीक्षा में स्वीकार किया कि उन्होंने करीब आठ साल तक पुत्र के पालन-पोषण और शिक्षा के खर्च के लिए पैसे नहीं भेजे। पिता को अपने पुत्र की जन्मतिथि की जानकारी नहीं होने तथा उसे लेने जाने की तारीखें याद नहीं होने जैसे तथ्य भी सामने आए।
दूसरी ओर, नानी की ओर से बालक की पढ़ाई और देखभाल से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि बालक लगभग 11 माह की उम्र से नानी के पास रह रहा था और उसकी शिक्षा एवं पालन-पोषण की व्यवस्था वहीं हो रही थी।
बालक की इच्छा को भी दिया महत्त्व
न्यायालय में बालक वासुदेव ने अपनी नानी के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की और पिता के साथ नहीं जाने की बात कही। न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों, बालक की वर्तमान परिस्थितियों, शिक्षा, पालन-पोषण और उसकी इच्छा पर विचार किया।
पिता की याचिका खारिज
सभी तथ्यों और साक्ष्यों के विवेचन के बाद न्यायालय ने पिता भागीरथ की ओर से दायर स्थायी संरक्षकता की याचिका अस्वीकार करते हुए खारिज कर दी। इस प्रकार बालक की संरक्षकता अपने पास लेने की पिता की मांग स्वीकार नहीं की गई और बालक के नानी के साथ रहने की मौजूदा व्यवस्था बरकरार रही।





























